Monday, February 13, 2017

पुनः वापसी 
  एक वापसी 2015 में हुई थी फिर वहीं रुक गयी। हालात ने साथ नहीं दिया। कुछ पैर के sprain  ने  कुछ अन्य घटनाओं ने जिनका जिक्र यहाँ अभी करना वाजिब नहीं है।. पुनः वापसी की कोशिश की वजह है किसी का इसरार ।  मैं 2015  काफी स्पष्टिकरण कर चुका। बार बार उन्ही बातों को दोहराना अच्छा नहीं लगता। एक बात और ब्लॉग में अब बहुत ज़रूरी हो गयी  है वह है  उसे आकर्षक और व्यवसायिक बनाना। यह मुझे नहीं आता। मुझे केवल लिखना आता है और मैं अपने परिचय में कह चुका हूँ कि मैं ब्लॉग को तकनीकी कलम और कागज़ समझ कर आया और वही समझ कर लिख रहा हूँ। इसे सुसज्जित करना या व्यावसायिक बनाने की छमता मुझमें नहीं है वह तकनीकी योग्यता का काम है जिनकी उपलब्धता मुझे फिलहाल सहज नहीं है। 
अब विषय पर आया जाए। मैं अब 82 वर्ष का हूँ।  मेरे जेहन में 1968  से एक ग़ज़ल के कुछ अशआर पड़े हुए थे , उन्हें अपना कहूँ या क्या कहूँ नहीं जानता। मेरे एक सहकर्मी और दोस्त थे रामानंद सिन्हा  ( उम्र में मुझसे बड़े थे और अब इस संसार में नहीं है ) जो चौथा दर्जा पास थे मगर  शायरी के मुरीद थे और अच्छी समझ रखते थे। उन दिनों या कभी भी मैंने छपने के लिए नहीं लिखा। कभी , कुछ  छपने के लिए भेज दिया वह दूसरी बात है वर्ना सरकारी नौकरी में इसकी स्वतंत्रता उस समय  नहीं थी। हम जैसे लोग लिखते थे  और आपसी बैठकों में पढ़ते सुनाते थे ,बहस करते थे , विवेचना  करते थे। कभी 2 गंभीर स्थितियां भी खड़ी हो जाती थीं लेकिन किसी न किसी तरह से समाधान हो ही जाता था। मैं अपने ख्याल अपनी रचनाओं का मंथन  सिन्हा जी के साथ भी  करता था। एक बहुत ही कठिन और भावुक समय में मैंने उन्हें अपनी रचना की निम्न  पंक्तियां  सुनाई।
      " निकालो ग़र अभी दिल में कोई अरमान बाकी है ,
                   अभी तो सांस आती है , अभी तो जान बाकी है। "
सिन्हा जी मेरी मानसिक स्थिति और द्वन्द से वाकिफ थे , गंभीर हो गए। बोले इन्हें कहीं डाल दो , बाद में बात करेंगे। मेरा दिमागी उलझाव् बढ़ता गया। मैं स्थानांतरित होकर पहाड़ ( hills )  चला गया , वहां बरसात की  एक तूफानी  रात में एक पंक्ति उभरी " मेरी  ज़िन्दगी  में इक  तूफ़ान आया  है "  मेरे जेहन में फिर वह ' मतला ' उभरा।उसके बाद भी कई आंधी तूफ़ान आये। तमाम पेड़ सड़कों पर  गिर जाते थे , रास्ते बंद हो जाते थे।  मेरा लखनऊ जाना हुआ , सिन्हा जी से चर्चा हुई। वह तब तक पहाड़ ( hills ) पर गए नहीं थे।  बोले 'वाह ' तूफ़ान आये पर तुम्हे तो कुछ नहीं हुआ न। तो फिर यूँ कहो न " हमारी ज़िन्दगी में कई तूफ़ान आये हैं ". धीरे 2  आगे  दी हुईं  दो पंक्तियों  को मिला कर चार पंक्तिया हुई। 
        " हमारी ज़िंदगी में बारहा तूफ़ान आये हैं,. 
              लगा दे जो किनारे से वही तूफ़ान बाकी है। "
मैं इसे अपनी और सिन्हा जी ," दोनों " की रचना मानता आया हूँ। गत सप्ताह किसी से इन्ही चार पंक्तियों  पर बात चल पड़ी  यह चार पंक्तिया मुंह से निकल गयी। उन्होंने इन्हें माँगा और ब्लॉग को पुनः चलाने की मांग की। मैंने कहा मुझे समय दो इनकी एक पृष्ठभूमि है उसे स्पष्ट करते हुए इसे पूरा करके मैं प्रस्तुत करूंगा। अपने सहयोगी श्री रामानंद सिन्हा जी को श्रद्धांजलि के साथ यहाँ प्रस्तुत है। इसे अभी सवारने और edit करने की आवश्यकता है किन्तु  मैं वचनवद्ध हूँ।  Edit बाद में करूँगा। 

                                                                 तूफ़ान 

                                   निकालो ग़र अभी दिल में कोई अरमान बाकी हैं 
                       अभी तो सांस आती है अभी तो   जान बाकी  है। 
                  यह दुनिया है यहाँ ज़ज़्बात के भी सौदे होते हैं ,
                                  चुकाई हर कदम कीमत , कोई भुगतान  बाकी है ? 
                                                                  .... अभी तो जान बाकी है। 
                 अब तलक जाना न उनको, अब जो जाना भी तो क्या,
                                   मेरा आगोश खाली है ,     तेरी पहचान बाकी है। 
                                                                            ... तूफान बाकी है। 
                  पहले एहसास, फिर ख्वाहिश , अजब है खेल किस्मत का ,
                                   कुछ साँसे बाकी हैं ,     बहुत अरमान बाकी हैं। 
                                                                           ...अरमान बाकी हैं। 
                  हमारी ज़िंदगी में बारहा तूफ़ान आये  हैं ,
                                     लगा दे जो किनारे से      वही तूफ़ान बाकी है। 
                                    अभी  तो सांस आती है अभी तो जान बाकी है। 



  

4 comments:

  1. वाह वाह बहुत बेहतरीन और लाजवाब अशआर कहे आप ने मोहतरम नगरामी साहब। दिली मुबारकबाद कुबूल फ़रमाएं मामा जी। - Manjull Manzar Lucknowi. (Mukul)
    आप के अशआर पढ़ कर अपनी ग़ज़ल का एक मतला और एक शेर याद आ गया पेश ए ख़िदमत है ---

    अभी हमारे परों में उड़ान बाकी है।
    अभी भी नापने को आसमान बाकी है।
    बनी बलन्द इमारत शहर में है तो क्या।
    अभी भी गाँव का कच्चा मकान बाकी है।
    ©® Manjull Manzar Lucknowi.

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    1. मेरी खामोशी मे सन्नाटा भी है शोर भी है
      तूने देखा ही नही जहन मे कुछ और भी है

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