Saturday, May 20, 2017

                                                     दर्द का दर्द 
                      
                   इक न इक दर्द पाल कर रखिये ,
                        उसे दिल में  संभाल   कर रखिये। 
                   ग़र  दर्द है तो तनहा नहीं हैं आप ,
                       इस इनायत को संभाल कर रखिये।
                   हज़ारों ख़्वाब आँखों में, पहरा सिर्फ पलकों का ,
                       सफ़र लम्बा है, ख़्वाब संभाल कर रखिये।
                   रात का वक़्त,हवा सर्द और बारिश,
                       फिसल न जाएँ कदम संभाल कर रखिये। 
                   वह दिखें भी तो निकल जाना ऐसे,
                      अजनबी रहगुज़र दामन संभाल कर रखिये।
                  ज़िन्दगी भी तो  एक तज़ुर्बा है ' श्रीदत्त '
                      आँख नम होती है, अश्क़ संभाल कर रखिये।  



                  

Monday, February 13, 2017

पुनः वापसी 
  एक वापसी 2015 में हुई थी फिर वहीं रुक गयी। हालात ने साथ नहीं दिया। कुछ पैर के sprain  ने  कुछ अन्य घटनाओं ने जिनका जिक्र यहाँ अभी करना वाजिब नहीं है।. पुनः वापसी की कोशिश की वजह है किसी का इसरार ।  मैं 2015  काफी स्पष्टिकरण कर चुका। बार बार उन्ही बातों को दोहराना अच्छा नहीं लगता। एक बात और ब्लॉग में अब बहुत ज़रूरी हो गयी  है वह है  उसे आकर्षक और व्यवसायिक बनाना। यह मुझे नहीं आता। मुझे केवल लिखना आता है और मैं अपने परिचय में कह चुका हूँ कि मैं ब्लॉग को तकनीकी कलम और कागज़ समझ कर आया और वही समझ कर लिख रहा हूँ। इसे सुसज्जित करना या व्यावसायिक बनाने की छमता मुझमें नहीं है वह तकनीकी योग्यता का काम है जिनकी उपलब्धता मुझे फिलहाल सहज नहीं है। 
अब विषय पर आया जाए। मैं अब 82 वर्ष का हूँ।  मेरे जेहन में 1968  से एक ग़ज़ल के कुछ अशआर पड़े हुए थे , उन्हें अपना कहूँ या क्या कहूँ नहीं जानता। मेरे एक सहकर्मी और दोस्त थे रामानंद सिन्हा  ( उम्र में मुझसे बड़े थे और अब इस संसार में नहीं है ) जो चौथा दर्जा पास थे मगर  शायरी के मुरीद थे और अच्छी समझ रखते थे। उन दिनों या कभी भी मैंने छपने के लिए नहीं लिखा। कभी , कुछ  छपने के लिए भेज दिया वह दूसरी बात है वर्ना सरकारी नौकरी में इसकी स्वतंत्रता उस समय  नहीं थी। हम जैसे लोग लिखते थे  और आपसी बैठकों में पढ़ते सुनाते थे ,बहस करते थे , विवेचना  करते थे। कभी 2 गंभीर स्थितियां भी खड़ी हो जाती थीं लेकिन किसी न किसी तरह से समाधान हो ही जाता था। मैं अपने ख्याल अपनी रचनाओं का मंथन  सिन्हा जी के साथ भी  करता था। एक बहुत ही कठिन और भावुक समय में मैंने उन्हें अपनी रचना की निम्न  पंक्तियां  सुनाई।
      " निकालो ग़र अभी दिल में कोई अरमान बाकी है ,
                   अभी तो सांस आती है , अभी तो जान बाकी है। "
सिन्हा जी मेरी मानसिक स्थिति और द्वन्द से वाकिफ थे , गंभीर हो गए। बोले इन्हें कहीं डाल दो , बाद में बात करेंगे। मेरा दिमागी उलझाव् बढ़ता गया। मैं स्थानांतरित होकर पहाड़ ( hills )  चला गया , वहां बरसात की  एक तूफानी  रात में एक पंक्ति उभरी " मेरी  ज़िन्दगी  में इक  तूफ़ान आया  है "  मेरे जेहन में फिर वह ' मतला ' उभरा।उसके बाद भी कई आंधी तूफ़ान आये। तमाम पेड़ सड़कों पर  गिर जाते थे , रास्ते बंद हो जाते थे।  मेरा लखनऊ जाना हुआ , सिन्हा जी से चर्चा हुई। वह तब तक पहाड़ ( hills ) पर गए नहीं थे।  बोले 'वाह ' तूफ़ान आये पर तुम्हे तो कुछ नहीं हुआ न। तो फिर यूँ कहो न " हमारी ज़िन्दगी में कई तूफ़ान आये हैं ". धीरे 2  आगे  दी हुईं  दो पंक्तियों  को मिला कर चार पंक्तिया हुई। 
        " हमारी ज़िंदगी में बारहा तूफ़ान आये हैं,. 
              लगा दे जो किनारे से वही तूफ़ान बाकी है। "
मैं इसे अपनी और सिन्हा जी ," दोनों " की रचना मानता आया हूँ। गत सप्ताह किसी से इन्ही चार पंक्तियों  पर बात चल पड़ी  यह चार पंक्तिया मुंह से निकल गयी। उन्होंने इन्हें माँगा और ब्लॉग को पुनः चलाने की मांग की। मैंने कहा मुझे समय दो इनकी एक पृष्ठभूमि है उसे स्पष्ट करते हुए इसे पूरा करके मैं प्रस्तुत करूंगा। अपने सहयोगी श्री रामानंद सिन्हा जी को श्रद्धांजलि के साथ यहाँ प्रस्तुत है। इसे अभी सवारने और edit करने की आवश्यकता है किन्तु  मैं वचनवद्ध हूँ।  Edit बाद में करूँगा। 

                                                                 तूफ़ान 

                                   निकालो ग़र अभी दिल में कोई अरमान बाकी हैं 
                       अभी तो सांस आती है अभी तो   जान बाकी  है। 
                  यह दुनिया है यहाँ ज़ज़्बात के भी सौदे होते हैं ,
                                  चुकाई हर कदम कीमत , कोई भुगतान  बाकी है ? 
                                                                  .... अभी तो जान बाकी है। 
                 अब तलक जाना न उनको, अब जो जाना भी तो क्या,
                                   मेरा आगोश खाली है ,     तेरी पहचान बाकी है। 
                                                                            ... तूफान बाकी है। 
                  पहले एहसास, फिर ख्वाहिश , अजब है खेल किस्मत का ,
                                   कुछ साँसे बाकी हैं ,     बहुत अरमान बाकी हैं। 
                                                                           ...अरमान बाकी हैं। 
                  हमारी ज़िंदगी में बारहा तूफ़ान आये  हैं ,
                                     लगा दे जो किनारे से      वही तूफ़ान बाकी है। 
                                    अभी  तो सांस आती है अभी तो जान बाकी है। 



  

Thursday, November 26, 2015

     वापसी 
मैं लगभग दो साल बाद यहाँ वापस लौटा हूँ। कारण कोई विशेष नहीं। उम्र, आलस्य और अनमनापन। वैसे भी मैं कहीं पहले भी लिख चुका हूँ कि यह ब्लॉग तो बस यूँ ही शुरू हो गया मेरी इधर उधर बिखरी आधी अधूरी रचनाओं को एक जगह करने  की बात से। मेरी रचनाओं में काफ़ी  काव्य दोष हो सकते हैं क्योंकि प्राथिमकता जज्बातों को है। खैर, अपनी रचनाओं के पुलिंदे में  कुछ समय पहले मुझे अपनी एक रचना मिल गयी। इसका समय काल 1984-85 का है जब लगभग 14 वर्ष (1972-1986) कलकत्ता रहने के उपरान्त मेरा स्थानांतर दिल्ली को हुआ। मैं दिल्ली आकर फिर परिवार को लाने हेतु कलकत्ता गया हुआ था। कलकत्ता के फुटपाथ  निवासियों की जीवनचर्या अपने में अनोखी थी ,शायद अभी भी है।  उनके शादी-ब्याह, जन्म मृत्यु, दुःख सुख सभी कुछ फुटपाथ पर ही होते हैं। इसमें उनमें किसी भी प्रकार की हीनता का बोध नहीं होता। बड़ी बड़ी  इमारतों के साये में परिवार बनते रहतें हैं  मिटते रहतें हैं। ट्राम ,बस में वे कंधे में कन्धा मिलाकर सभी के साथ चलते हैं। कलकत्ता रहना मैं अपने जीवन का सौभाग्य मानता हूँ जहाँ मानवता व मानवीय जीवन  के कई पक्षों का अनुभव मुझे हुआ। इस कविता में  फुटपाथ पर गंभीर रूप से बीमार पड़े व्यक्ति को देख कर उठे भावों की अभिव्यक्ति है। यह रचना भी "सरिता /मुक्ता " में प्रकाशन  के लिए भेजी गई थी।  प्रकाशित हुई या नहीं इसकी स्मृति मुझे नहीं है। वर्षों बाद भी   भी बहुत्त कुछ वहीँ  का  वहीँ लगता है। रचना यहां प्रस्तुत है।

                                                         स्वराज  
                  जो फुटपाथ पर पड़ा है , वह लाश नहीं है ,
                 जिन्दा है मगर जिंदगी का एहसास नहीं है। 
               
                ठोकर लगी किसी की तो धीरे से कह पड़ा ,
                  बच के निकल जाइए , कोई बात नहीं है 
                  
                   बंगलों में रह रहें है,उसके नुमायन्दे ,
                 यह बात और है वहां, उसकी आवाज़ नहीं है। 
                   
                 गरीबों पर बहस है वातानुकूलित भवनों में,
                   कहता है कौन , देश में स्वराज नहीं है। 
                 
                  गरीबी मुख्य मुद्दा है, हर दल के दलदल में ,
                   पूछिये किसी नेता से ,गर विश्वास  नहीं  है। 
                  
                   रोटी मकान कपड़ा क्यों मांगते है लोग ,
                    जब संविधान है तो क्या पास नहीं है। 
                 
                   गुलशन में सिर्फ गुल व बुलबुलों का जिक्र ,
                    क्या आम नीम की कोई औकात नहीं है। 
                  
               जाऊं अगर दिल्ली तो क्या कहूँ दौरे हुकूमत से,
                     जज़्बात  तो हैं लेकिन अलफ़ाज़  नहीं हैं। 
  

Wednesday, January 2, 2013

नव वर्ष की शुभकामनाएं व संकल्प

  नव वर्ष की शुभकामनाएं व संकल्प 

नव वर्ष के अवसर पर ,
यह सन्देश हमारा पायें।
आओ हम सब मिल कर,
ऐसा अभियान चलायें।
नारी का सम्मान बढे,
हो समाप्त सभी वेदनाएं।
"निर्भय" हो पूरी निर्भय,
कोई उसे सता न पाए।
पूर्ण समर्पित होकर,
हम ऐसा दीप जलायें।
न्याय का उजियारा हो ,
भय को दूर भगाएं।



आओ हम सब मिल कर,
ऐसा अभियान चलायें
नव वर्ष साहसपूर्ण व शुभ हो
श्रीदत्त शुक्ल

  1.  

Monday, December 10, 2012

आलेख

काजर की कोठरी .....

1999 के आस पास भारत के क्षितिज पर एक नए सितारे का उदय हुआ - अरविन्द केजरीवाल. सूचना के अधिकार, उसका प्रयोग तथा समझ और प्राप्त सूचना को जनता तक पहुंचाना और समझाना उनकी विशेषता बनी। 2006 तक इस सितारे की चमक और बढ़ी और उसे एक विशिष्टता मिली। जन लोक पाल बिल व इस सम्बन्ध में जो आन्दोलन हुआ उसमे वह अन्ना हजारे के साथ प्रमुख लोगों में थे और इसकी सराहना भी उन्हें मिली . जन मानस को यह आभास होने लगा कि भारत में एक दूसरी आज़ादी की आवाज़ उठ रही है।
 
भारत में राजनीति एक व्यवसाय बन गई है। शोषण करने वाले कुछ विदेशी हटे तो हमने उसे आज़ादी कह कर जश्न मनाया लेकिन बहुत जल्दी समझ में आने लगा कि शोषण करने के कला कौशल में तो अपने भी उनसे कम नहीं हैं . भारत में राजनीति एक व्यवसाय बन गयी है जिसके लिए किसी योग्यता की आवश्यकता नहीं है . जनप्रतिनिधि के चुनाव प्रक्रिया में धन और शक्ति का बोल बाला है। अपराधी,भ्रष्टाचारी और पारिवारिक जमींदारी ने देशमें लोकतंत्र पर पकड़ बना ली है . अपवाद स्वरुप यदि कुछ योग्य इमानदारऔर जनहित सोचने या करने वाले लोग हैं भी तो उनकी आवाज़ बहुमत के नाम पर मच रहे शोर और धांधली में डूब जाती है . जनता बेबसी से सब कुछ सहती रहती है . ऐसे माहौल में जब कोई जनहित में आवाज़ उठाता है तो पहले तो उसे दबाने या किनारे करने की कोशिस की जाती है . नहीं तो उसेलालच दिया जाता है या चुनौती दी जाती है कि चुनावी प्रक्रिया में आ जाओ और हमारी जमात में शामिल हो जाओ. मेरी समझ में यही केजरीवाल के साथ भी हुआ . वह जाने अनजाने इस जाल में आ गए . एक कहावत है
 
" काजर की कोठरी में कैसहू सयानो जाए एक लीक काजर की लागिहै तो लागिहै "

वह राजनीति की कोठरी में आ तो गए. उन्होंने एक दल ( पार्टी ) भी बना लिया . अब प्रश्न है काजर(काजल ) से बचने का और जो उनके साथ दल ( पार्टी ) में हों उनको भी बचा कर रखने का . इमरजेंसी के बाद जब जनता दल बना था तब भी कुछ ऐसा ही माहौल था और अब उनमे से ही बचे हुए कुछ लोग हैं जिन पर उंगलियाँ उठ रही हैं .
लोकतंत्र में या समाज में सचेतक ( whistle blower ) की एक महत्वपूर्ण और अहम् भूमिका होती है . वह " जागते रहो ""खबरदार, होशियार "की आवाज़ लगाता रहता है .सूचना देता रहता है यह समाज का काम है कि उस सूचना के आधार पर अपनी सुरक्षा व व्यवस्था के प्रबंध करे अब तक केजरीवाल जी सचेतक का काम करते रहे . मैं केजरीवाल का प्रशंसक हूँ उम्मीद करता हूँ कि उनके पास काजल से बचने का और अपनी पार्टी वालों को बचा कर रखने का कोई नुस्खा जरूर होगा।

Tuesday, February 28, 2012

मुक्तक

      सपनों में सुन्दर प्रिय का,
                                          निर्मम रूप संवारे,
      गए वहीं  हर बार जहां हम,
                                           जीती बाज़ी हारे ।     ( 1954 )

                              ____________

      सोते से  मत मुझे जगाओ,
                                          पीड़ा  होती जगने में,
       जाग्रति  से  नींद  भली  है,
                                        प्रिय आते  हैं सपने  में  । ( 1955)

                            _____________




      मत  पूछो  किसने  तोड़ा,
                                     मेरे  मधु  का  प्याला ,
      अनजाने  में  मैंने  ही,
                                      कुछ  ऐसा  है  कर डाला  ।  (1955 )


                         _____________

       न जाने लोग कैसे  फरेब इख्तियार करते हैं ,
                कहीं यक़ीं, कहीं प्यार का व्यापार करतें हैं। 
     उनके हुसनो अदा का भरम उलझाता ऐसा है ,
               वह गुमराह करतें  हैं,  हम  ऐतबार  करते हैं। ( मई 2017 )
                                                           



                                                                    
           

Saturday, April 9, 2011

LITERARY SOCIETY




Hover the mouse on the picture to see detail (it takes some time for the detail to load). The picture can be downloaded by clicking the right mouse button on the picture and then following the instructions. Once downloaded, the picture can be viewed using a picture viewer.

The names printed in the photograph are given below for easy reading.







(From L to R)
Sitting
M/s Prem Chandra Gupta(Vice-President), C.L.Mittal (B.Sc. Representative), C.P.Gupta (Co-opted Member), K.C.Mathur (President), M.G.Mishra (Patron), B.B.Mishra (Treasure), P.N.Srivastava (Joint Secretary and class representative XII B), S.D.Shukla (Secretary & Founder), Amar Chand Seth (Representative B.Sc.)


Standing Ist Row (Class Rept.)

R.P.S.Verma (Reporter & Founder), R.P.Jindal (XII H), S.C.Malviya (XII C), T.P.Sinha (XII D), L.N.Gupta (XII I), Nand Kishore Sharma (XII F), J.P.Tiwari (XII A), Mool Chandra Agrawal (XI G),

Standing IInd Row (Class Rept.)

Anand Prakash (XI E), Om Prakash Seth (Xi D), S.S.Tiwari (XI C), P.N.Tripathi (XI H), Samerjit Singh (XI I), K.C. Mehrotra (XI B), P.C.Verma (XI A), S.C.Garg (XI F)


भूली -बिसरी

10 फरवरी 1950 को मेरी माँ का देहांत हुआ.मार्च में हाई स्कूल की परीक्षा थी.स्कूल के समय से ही रूचि साहित्य में थी। माँ के देहांत के पश्चात और बढ़ गई। हाई स्कूल विद्यांत हिन्दू हाई स्कूल लखनऊ से किया विद्यांत में उस समय शायद विज्ञानं में intermediate (अंतरमाध्यिक) नहीं था। कान्यकुब्ज कॉलेज में intermediate (अंतरमाध्यिक) में प्रवेश लिया। अधिक रूचि साहित्य में थी लेकिन विषय थे विज्ञान, गणित आदि.क्योंकि इस क्षेत्र में नौकरी की संभावनाएं अधिक थी। घर में वातावरण भी साहित्य का था पिताजी अध्यापक थे और साहित्य का अच्छा ज्ञान रखते थे। कवि सम्मेलनों व साहित्यिक गोष्ठियों में उनके साथ जाना होता था घर में हिंदी साहित्य की पुस्तकें भरी हुई थी। घर में साहित्यिक व्यक्तियों का आना होता था मैं अंताछरी, वादविवाद प्रतियोगिताओं में भाग लेता था गांधीजी के निधन पर मेरी एक कविता स्कूल की पत्रिका में छपी थी।

कॉलेज में भी साहित्य में मेरा लगाव छुपा नहीं रहा। उस समय कान्यकुब्ज कॉलेज में संसद ( parliament ) भी हुआ करती थी। उसमें भी भाग लिया। एक साहित्यिक संस्था बनाने की बात मन में उठी। ऐसे विचार भले ही किसी के मन में उठे लेकिन यह पल्लवित जभी होते हैं जब सभी का सहयोग मिले। ग्यारहवें क्लास का छात्र होते हुए भी गुरुजनों से प्रोत्साहन मिला। मुख्य थे अंग्रेजी के प्राध्यापक श्री के.सी.  माथुर। उनके मार्गदर्शन से LITERARY SOCIETY की स्थापना हुई। सबसे बड़ी बात यह की इस प्रयास को वरिष्ठ लोगों ने हाथों हाथ लिया और सोसाइटी ने छपी हुई त्रैमासिक पत्रिका प्रकाशित की जिसके दो भाग थे। अंग्रेज़ी का "LITSO" और हिंदी का "साहित्यलोक"। इस सोसाइटी का उद्घाटन उस समय लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉक्टर एन. के. सिद्धांत ने किया था।

यहाँ फोटोग्राफ में उस समय सोसाइटी के लगभग सभी मुख्य कार्यकर्ता हैं। यह फोटोग्राफ मेरे पास था और मैं इसे भूल सा गया था। लेकिन अचानक वर्ष 2007-08 से कान्यकुब्ज कॉलेज के भूगर्भशास्त्र के प्रोफेसर डॉक्टर रामजी तिवारी से संपर्क हुआ तो मैने अब यह निधि इस आशय से उनको सौंप दी है की यह विद्यालय में पहुँच जाये।