The names printed in the photograph are given below for easy reading.
(From L to R)
Sitting
M/s Prem Chandra Gupta(Vice-President), C.L.Mittal (B.Sc. Representative), C.P.Gupta (Co-opted Member), K.C.Mathur (President), M.G.Mishra (Patron), B.B.Mishra (Treasure), P.N.Srivastava (Joint Secretary and class representative XII B), S.D.Shukla (Secretary & Founder), Amar Chand Seth (Representative B.Sc.)
Standing Ist Row (Class Rept.)
R.P.S.Verma (Reporter & Founder), R.P.Jindal (XII H), S.C.Malviya (XII C), T.P.Sinha (XII D), L.N.Gupta (XII I), Nand Kishore Sharma (XII F), J.P.Tiwari (XII A), Mool Chandra Agrawal (XI G),
Standing IInd Row (Class Rept.)
Anand Prakash (XI E), Om Prakash Seth (Xi D), S.S.Tiwari (XI C), P.N.Tripathi (XI H), Samerjit Singh (XI I), K.C. Mehrotra (XI B), P.C.Verma (XI A), S.C.Garg (XI F)
भूली -बिसरी
10 फरवरी 1950 को मेरी माँ का देहांत हुआ.मार्च में हाई स्कूल की परीक्षा थी.स्कूल के समय से ही रूचि साहित्य में थी। माँ के देहांत के पश्चात और बढ़ गई। हाई स्कूल विद्यांत हिन्दू हाई स्कूल लखनऊ से किया विद्यांत में उस समय शायद विज्ञानं में intermediate (अंतरमाध्यिक) नहीं था। कान्यकुब्ज कॉलेज में intermediate (अंतरमाध्यिक) में प्रवेश लिया। अधिक रूचि साहित्य में थी लेकिन विषय थे विज्ञान, गणित आदि.क्योंकि इस क्षेत्र में नौकरी की संभावनाएं अधिक थी। घर में वातावरण भी साहित्य का था पिताजी अध्यापक थे और साहित्य का अच्छा ज्ञान रखते थे। कवि सम्मेलनों व साहित्यिक गोष्ठियों में उनके साथ जाना होता था घर में हिंदी साहित्य की पुस्तकें भरी हुई थी। घर में साहित्यिक व्यक्तियों का आना होता था मैं अंताछरी, वादविवाद प्रतियोगिताओं में भाग लेता था गांधीजी के निधन पर मेरी एक कविता स्कूल की पत्रिका में छपी थी।
कॉलेज में भी साहित्य में मेरा लगाव छुपा नहीं रहा। उस समय कान्यकुब्ज कॉलेज में संसद ( parliament ) भी हुआ करती थी। उसमें भी भाग लिया। एक साहित्यिक संस्था बनाने की बात मन में उठी। ऐसे विचार भले ही किसी के मन में उठे लेकिन यह पल्लवित जभी होते हैं जब सभी का सहयोग मिले। ग्यारहवें क्लास का छात्र होते हुए भी गुरुजनों से प्रोत्साहन मिला। मुख्य थे अंग्रेजी के प्राध्यापक श्री के.सी. माथुर। उनके मार्गदर्शन से LITERARY SOCIETY की स्थापना हुई। सबसे बड़ी बात यह की इस प्रयास को वरिष्ठ लोगों ने हाथों हाथ लिया और सोसाइटी ने छपी हुई त्रैमासिक पत्रिका प्रकाशित की जिसके दो भाग थे। अंग्रेज़ी का "LITSO" और हिंदी का "साहित्यलोक"। इस सोसाइटी का उद्घाटन उस समय लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉक्टर एन. के. सिद्धांत ने किया था।
यहाँ फोटोग्राफ में उस समय सोसाइटी के लगभग सभी मुख्य कार्यकर्ता हैं। यह फोटोग्राफ मेरे पास था और मैं इसे भूल सा गया था। लेकिन अचानक वर्ष 2007-08 से कान्यकुब्ज कॉलेज के भूगर्भशास्त्र के प्रोफेसर डॉक्टर रामजी तिवारी से संपर्क हुआ तो मैने अब यह निधि इस आशय से उनको सौंप दी है की यह विद्यालय में पहुँच जाये।
कॉलेज में भी साहित्य में मेरा लगाव छुपा नहीं रहा। उस समय कान्यकुब्ज कॉलेज में संसद ( parliament ) भी हुआ करती थी। उसमें भी भाग लिया। एक साहित्यिक संस्था बनाने की बात मन में उठी। ऐसे विचार भले ही किसी के मन में उठे लेकिन यह पल्लवित जभी होते हैं जब सभी का सहयोग मिले। ग्यारहवें क्लास का छात्र होते हुए भी गुरुजनों से प्रोत्साहन मिला। मुख्य थे अंग्रेजी के प्राध्यापक श्री के.सी. माथुर। उनके मार्गदर्शन से LITERARY SOCIETY की स्थापना हुई। सबसे बड़ी बात यह की इस प्रयास को वरिष्ठ लोगों ने हाथों हाथ लिया और सोसाइटी ने छपी हुई त्रैमासिक पत्रिका प्रकाशित की जिसके दो भाग थे। अंग्रेज़ी का "LITSO" और हिंदी का "साहित्यलोक"। इस सोसाइटी का उद्घाटन उस समय लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉक्टर एन. के. सिद्धांत ने किया था।
यहाँ फोटोग्राफ में उस समय सोसाइटी के लगभग सभी मुख्य कार्यकर्ता हैं। यह फोटोग्राफ मेरे पास था और मैं इसे भूल सा गया था। लेकिन अचानक वर्ष 2007-08 से कान्यकुब्ज कॉलेज के भूगर्भशास्त्र के प्रोफेसर डॉक्टर रामजी तिवारी से संपर्क हुआ तो मैने अब यह निधि इस आशय से उनको सौंप दी है की यह विद्यालय में पहुँच जाये।


