Monday, December 10, 2012

आलेख

काजर की कोठरी .....

1999 के आस पास भारत के क्षितिज पर एक नए सितारे का उदय हुआ - अरविन्द केजरीवाल. सूचना के अधिकार, उसका प्रयोग तथा समझ और प्राप्त सूचना को जनता तक पहुंचाना और समझाना उनकी विशेषता बनी। 2006 तक इस सितारे की चमक और बढ़ी और उसे एक विशिष्टता मिली। जन लोक पाल बिल व इस सम्बन्ध में जो आन्दोलन हुआ उसमे वह अन्ना हजारे के साथ प्रमुख लोगों में थे और इसकी सराहना भी उन्हें मिली . जन मानस को यह आभास होने लगा कि भारत में एक दूसरी आज़ादी की आवाज़ उठ रही है।
 
भारत में राजनीति एक व्यवसाय बन गई है। शोषण करने वाले कुछ विदेशी हटे तो हमने उसे आज़ादी कह कर जश्न मनाया लेकिन बहुत जल्दी समझ में आने लगा कि शोषण करने के कला कौशल में तो अपने भी उनसे कम नहीं हैं . भारत में राजनीति एक व्यवसाय बन गयी है जिसके लिए किसी योग्यता की आवश्यकता नहीं है . जनप्रतिनिधि के चुनाव प्रक्रिया में धन और शक्ति का बोल बाला है। अपराधी,भ्रष्टाचारी और पारिवारिक जमींदारी ने देशमें लोकतंत्र पर पकड़ बना ली है . अपवाद स्वरुप यदि कुछ योग्य इमानदारऔर जनहित सोचने या करने वाले लोग हैं भी तो उनकी आवाज़ बहुमत के नाम पर मच रहे शोर और धांधली में डूब जाती है . जनता बेबसी से सब कुछ सहती रहती है . ऐसे माहौल में जब कोई जनहित में आवाज़ उठाता है तो पहले तो उसे दबाने या किनारे करने की कोशिस की जाती है . नहीं तो उसेलालच दिया जाता है या चुनौती दी जाती है कि चुनावी प्रक्रिया में आ जाओ और हमारी जमात में शामिल हो जाओ. मेरी समझ में यही केजरीवाल के साथ भी हुआ . वह जाने अनजाने इस जाल में आ गए . एक कहावत है
 
" काजर की कोठरी में कैसहू सयानो जाए एक लीक काजर की लागिहै तो लागिहै "

वह राजनीति की कोठरी में आ तो गए. उन्होंने एक दल ( पार्टी ) भी बना लिया . अब प्रश्न है काजर(काजल ) से बचने का और जो उनके साथ दल ( पार्टी ) में हों उनको भी बचा कर रखने का . इमरजेंसी के बाद जब जनता दल बना था तब भी कुछ ऐसा ही माहौल था और अब उनमे से ही बचे हुए कुछ लोग हैं जिन पर उंगलियाँ उठ रही हैं .
लोकतंत्र में या समाज में सचेतक ( whistle blower ) की एक महत्वपूर्ण और अहम् भूमिका होती है . वह " जागते रहो ""खबरदार, होशियार "की आवाज़ लगाता रहता है .सूचना देता रहता है यह समाज का काम है कि उस सूचना के आधार पर अपनी सुरक्षा व व्यवस्था के प्रबंध करे अब तक केजरीवाल जी सचेतक का काम करते रहे . मैं केजरीवाल का प्रशंसक हूँ उम्मीद करता हूँ कि उनके पास काजल से बचने का और अपनी पार्टी वालों को बचा कर रखने का कोई नुस्खा जरूर होगा।

Tuesday, February 28, 2012

मुक्तक

      सपनों में सुन्दर प्रिय का,
                                          निर्मम रूप संवारे,
      गए वहीं  हर बार जहां हम,
                                           जीती बाज़ी हारे ।     ( 1954 )

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      सोते से  मत मुझे जगाओ,
                                          पीड़ा  होती जगने में,
       जाग्रति  से  नींद  भली  है,
                                        प्रिय आते  हैं सपने  में  । ( 1955)

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      मत  पूछो  किसने  तोड़ा,
                                     मेरे  मधु  का  प्याला ,
      अनजाने  में  मैंने  ही,
                                      कुछ  ऐसा  है  कर डाला  ।  (1955 )


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       न जाने लोग कैसे  फरेब इख्तियार करते हैं ,
                कहीं यक़ीं, कहीं प्यार का व्यापार करतें हैं। 
     उनके हुसनो अदा का भरम उलझाता ऐसा है ,
               वह गुमराह करतें  हैं,  हम  ऐतबार  करते हैं। ( मई 2017 )