कुछ लोग मानव समाज को धर्म व संप्रदाय के नाम पर विभाजित कर के उन्हे लड़ा कर अपने स्वार्थ की पूर्ति करते हैं. यह रचना इसी विषय पर है व हिंदी पत्रिका मुक्ता" के मार्च (प्रथम) १९८६, अंक ४६९ में प्रकाशित हुई थी.
फितरत तो देखिये
मजहबों की आपसी नफरत तो देखिये,
इन खुदाओं की जरा फितरत तो देखिये.
काटते हैं गर्दन और फूंकते हैं घर,
मुक्ति के तलाशगारों की इबादत तो देखिये.
लोग बेहोश हैं मजहबों के नशे में,
इस दौरे नशाबंदी की असलियत तो देखिये
करते हैं बात दुनिया में प्यार दया की,
इन छदम्वेशियों की हकीकत तो देखिये.
चुपचाप बहुत दिन था मगर अब न रह सका,
सूली मिले या गोली मेरी हिम्मत तो देखिये
इस दौरे गर्दिश में कहीं ग़र खुदा मिला,
मिलती है फिर किसे नसीहत तो देखिये
Tuesday, January 4, 2011
Saturday, January 1, 2011
दो पंक्तिया
( में रचनाकाल दिया गया है )
11. हम तो इस दुनिया में यूँ ही चले आये ,
न दुनिया को हमसे काम था , न हमको दुनिया से
( जुलाई 2015 )
12. वह ऐसी घटा थी जो आँखों से ही बरसी ,
मैं भीगता रहा सावन से लिपट कर
( फरवरी 2017 )
13 वह पहलु में आ के बैठे और छू लिया ,
दिल धड़क गया , मुझे ज़िंदगी मिली
14 एहसास ज़िंदगी है सुनते आये थे " श्रीदत्त "
एहसास जब हुआ रुखसत का वक़्त है
1. रात के पिछले पहर चुपके से कोई कहता है
नींद पूरी हो गयी हो तो आओ कुछ बातें करें
(रचनाकाल - 2005)
________
2. ढूंढता हूँ दूर तक, नज़र आता नहीं कोई,
जिसके साथ बैठ कर एक शाम गुजारी जाए
(.... मई 2010)
________
3. हमसे न पूछिए ज़िन्दगी का रंग,
हमने उन्हें करीब से देखा नहीं कभी
(2005)
________
4. मुझको नहीं पता मेरी ज़िन्दगी का मकसद,
मुझे गुनाह करने का मौका नहीं मिला
________
5. तोड़ दो दोनों किनारे रात के,
न हो जिक्र शाम का, न बात सुबह की
(30 दिसम्बर 2010)
________
6. इस रात के अँधेरे में धूप बहुत है
साए में ले चलो, कुछ चैन तो मिले
(31 दिसम्बर, 2010)
________
7. उन दिनों था बदहवाश, मुझको पता नहीं,
क्यों हुआ, कब हुआ, कैसे हुआ, क्या क्या हुआ
(9 जनवरी, 2011)
________
8. पत्थर हैं बेशुमार सारे जहान में,
जिसे खुदा समझ लिया उसे सर झुका दिया
(2002)
________
9. मुद्दतें हुई उस बात को हुए,
कुछ याद सा आता है पर याद नहीं आता
(25 दिसम्बर 2011)
________
10. कुछ पाने के लिए कुछ करना पड़ता है
गुमनामी से बदनामी यूँ ही नहीं मिलती
( अक्टूबर 2014)नींद पूरी हो गयी हो तो आओ कुछ बातें करें
(रचनाकाल - 2005)
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2. ढूंढता हूँ दूर तक, नज़र आता नहीं कोई,
जिसके साथ बैठ कर एक शाम गुजारी जाए
(.... मई 2010)
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3. हमसे न पूछिए ज़िन्दगी का रंग,
हमने उन्हें करीब से देखा नहीं कभी
(2005)
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4. मुझको नहीं पता मेरी ज़िन्दगी का मकसद,
मुझे गुनाह करने का मौका नहीं मिला
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5. तोड़ दो दोनों किनारे रात के,
न हो जिक्र शाम का, न बात सुबह की
(30 दिसम्बर 2010)
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6. इस रात के अँधेरे में धूप बहुत है
साए में ले चलो, कुछ चैन तो मिले
(31 दिसम्बर, 2010)
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7. उन दिनों था बदहवाश, मुझको पता नहीं,
क्यों हुआ, कब हुआ, कैसे हुआ, क्या क्या हुआ
(9 जनवरी, 2011)
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8. पत्थर हैं बेशुमार सारे जहान में,
जिसे खुदा समझ लिया उसे सर झुका दिया
(2002)
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9. मुद्दतें हुई उस बात को हुए,
कुछ याद सा आता है पर याद नहीं आता
(25 दिसम्बर 2011)
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10. कुछ पाने के लिए कुछ करना पड़ता है
गुमनामी से बदनामी यूँ ही नहीं मिलती
11. हम तो इस दुनिया में यूँ ही चले आये ,
न दुनिया को हमसे काम था , न हमको दुनिया से
( जुलाई 2015 )
12. वह ऐसी घटा थी जो आँखों से ही बरसी ,
मैं भीगता रहा सावन से लिपट कर
( फरवरी 2017 )
13 वह पहलु में आ के बैठे और छू लिया ,
दिल धड़क गया , मुझे ज़िंदगी मिली
14 एहसास ज़िंदगी है सुनते आये थे " श्रीदत्त "
एहसास जब हुआ रुखसत का वक़्त है
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