वापसी
मैं लगभग दो साल बाद यहाँ वापस लौटा हूँ। कारण कोई विशेष नहीं। उम्र, आलस्य और अनमनापन। वैसे भी मैं कहीं पहले भी लिख चुका हूँ कि यह ब्लॉग तो बस यूँ ही शुरू हो गया मेरी इधर उधर बिखरी आधी अधूरी रचनाओं को एक जगह करने की बात से। मेरी रचनाओं में काफ़ी काव्य दोष हो सकते हैं क्योंकि प्राथिमकता जज्बातों को है। खैर, अपनी रचनाओं के पुलिंदे में कुछ समय पहले मुझे अपनी एक रचना मिल गयी। इसका समय काल 1984-85 का है जब लगभग 14 वर्ष (1972-1986) कलकत्ता रहने के उपरान्त मेरा स्थानांतर दिल्ली को हुआ। मैं दिल्ली आकर फिर परिवार को लाने हेतु कलकत्ता गया हुआ था। कलकत्ता के फुटपाथ निवासियों की जीवनचर्या अपने में अनोखी थी ,शायद अभी भी है। उनके शादी-ब्याह, जन्म मृत्यु, दुःख सुख सभी कुछ फुटपाथ पर ही होते हैं। इसमें उनमें किसी भी प्रकार की हीनता का बोध नहीं होता। बड़ी बड़ी इमारतों के साये में परिवार बनते रहतें हैं मिटते रहतें हैं। ट्राम ,बस में वे कंधे में कन्धा मिलाकर सभी के साथ चलते हैं। कलकत्ता रहना मैं अपने जीवन का सौभाग्य मानता हूँ जहाँ मानवता व मानवीय जीवन के कई पक्षों का अनुभव मुझे हुआ। इस कविता में फुटपाथ पर गंभीर रूप से बीमार पड़े व्यक्ति को देख कर उठे भावों की अभिव्यक्ति है। यह रचना भी "सरिता /मुक्ता " में प्रकाशन के लिए भेजी गई थी। प्रकाशित हुई या नहीं इसकी स्मृति मुझे नहीं है। वर्षों बाद भी भी बहुत्त कुछ वहीँ का वहीँ लगता है। रचना यहां प्रस्तुत है।
मैं लगभग दो साल बाद यहाँ वापस लौटा हूँ। कारण कोई विशेष नहीं। उम्र, आलस्य और अनमनापन। वैसे भी मैं कहीं पहले भी लिख चुका हूँ कि यह ब्लॉग तो बस यूँ ही शुरू हो गया मेरी इधर उधर बिखरी आधी अधूरी रचनाओं को एक जगह करने की बात से। मेरी रचनाओं में काफ़ी काव्य दोष हो सकते हैं क्योंकि प्राथिमकता जज्बातों को है। खैर, अपनी रचनाओं के पुलिंदे में कुछ समय पहले मुझे अपनी एक रचना मिल गयी। इसका समय काल 1984-85 का है जब लगभग 14 वर्ष (1972-1986) कलकत्ता रहने के उपरान्त मेरा स्थानांतर दिल्ली को हुआ। मैं दिल्ली आकर फिर परिवार को लाने हेतु कलकत्ता गया हुआ था। कलकत्ता के फुटपाथ निवासियों की जीवनचर्या अपने में अनोखी थी ,शायद अभी भी है। उनके शादी-ब्याह, जन्म मृत्यु, दुःख सुख सभी कुछ फुटपाथ पर ही होते हैं। इसमें उनमें किसी भी प्रकार की हीनता का बोध नहीं होता। बड़ी बड़ी इमारतों के साये में परिवार बनते रहतें हैं मिटते रहतें हैं। ट्राम ,बस में वे कंधे में कन्धा मिलाकर सभी के साथ चलते हैं। कलकत्ता रहना मैं अपने जीवन का सौभाग्य मानता हूँ जहाँ मानवता व मानवीय जीवन के कई पक्षों का अनुभव मुझे हुआ। इस कविता में फुटपाथ पर गंभीर रूप से बीमार पड़े व्यक्ति को देख कर उठे भावों की अभिव्यक्ति है। यह रचना भी "सरिता /मुक्ता " में प्रकाशन के लिए भेजी गई थी। प्रकाशित हुई या नहीं इसकी स्मृति मुझे नहीं है। वर्षों बाद भी भी बहुत्त कुछ वहीँ का वहीँ लगता है। रचना यहां प्रस्तुत है।
स्वराज
जो फुटपाथ पर पड़ा है , वह लाश नहीं है ,
जिन्दा है मगर जिंदगी का एहसास नहीं है।
ठोकर लगी किसी की तो धीरे से कह पड़ा ,
बच के निकल जाइए , कोई बात नहीं है
बंगलों में रह रहें है,उसके नुमायन्दे ,
यह बात और है वहां, उसकी आवाज़ नहीं है।
गरीबों पर बहस है वातानुकूलित भवनों में,
कहता है कौन , देश में स्वराज नहीं है।
गरीबी मुख्य मुद्दा है, हर दल के दलदल में ,
पूछिये किसी नेता से ,गर विश्वास नहीं है।
रोटी मकान कपड़ा क्यों मांगते है लोग ,
जब संविधान है तो क्या पास नहीं है।
गुलशन में सिर्फ गुल व बुलबुलों का जिक्र ,
क्या आम नीम की कोई औकात नहीं है।
जाऊं अगर दिल्ली तो क्या कहूँ दौरे हुकूमत से,
जज़्बात तो हैं लेकिन अलफ़ाज़ नहीं हैं।
जो फुटपाथ पर पड़ा है , वह लाश नहीं है ,
जिन्दा है मगर जिंदगी का एहसास नहीं है।
ठोकर लगी किसी की तो धीरे से कह पड़ा ,
बच के निकल जाइए , कोई बात नहीं है
बंगलों में रह रहें है,उसके नुमायन्दे ,
यह बात और है वहां, उसकी आवाज़ नहीं है।
गरीबों पर बहस है वातानुकूलित भवनों में,
कहता है कौन , देश में स्वराज नहीं है।
गरीबी मुख्य मुद्दा है, हर दल के दलदल में ,
पूछिये किसी नेता से ,गर विश्वास नहीं है।
रोटी मकान कपड़ा क्यों मांगते है लोग ,
जब संविधान है तो क्या पास नहीं है।
गुलशन में सिर्फ गुल व बुलबुलों का जिक्र ,
क्या आम नीम की कोई औकात नहीं है।
जाऊं अगर दिल्ली तो क्या कहूँ दौरे हुकूमत से,
जज़्बात तो हैं लेकिन अलफ़ाज़ नहीं हैं।
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