कुछ लोग मानव समाज को धर्म व संप्रदाय के नाम पर विभाजित कर के उन्हे लड़ा कर अपने स्वार्थ की पूर्ति करते हैं. यह रचना इसी विषय पर है व हिंदी पत्रिका मुक्ता" के मार्च (प्रथम) १९८६, अंक ४६९ में प्रकाशित हुई थी.
फितरत तो देखिये
मजहबों की आपसी नफरत तो देखिये,
इन खुदाओं की जरा फितरत तो देखिये.
काटते हैं गर्दन और फूंकते हैं घर,
मुक्ति के तलाशगारों की इबादत तो देखिये.
लोग बेहोश हैं मजहबों के नशे में,
इस दौरे नशाबंदी की असलियत तो देखिये
करते हैं बात दुनिया में प्यार दया की,
इन छदम्वेशियों की हकीकत तो देखिये.
चुपचाप बहुत दिन था मगर अब न रह सका,
सूली मिले या गोली मेरी हिम्मत तो देखिये
इस दौरे गर्दिश में कहीं ग़र खुदा मिला,
मिलती है फिर किसे नसीहत तो देखिये


Excellent composition.
ReplyDeleteSuggest write your Biography here for us to read....
I agree , uncleji should write his biography in a form of rich story of his life for everyone to read and gain from it....
DeleteBeautiful Thoughts And would like to read more
ReplyDeleteशुक्रिया। Index में 2015 में शीर्षक " वापसी " और February 2017 में " पुनः वापसी " शीर्षक में दो रचनाएं हैं। मेरी दरख्वास्त है कि आप इन दोनो रचनाऔ पर भी अपनी राय दें।
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